बिहार के मोकामा में डॉन-टर्न-राजनेता दुलारचंद यादव की गोली मारकर हत्या। चुनाव से पहले इस हिंसा ने पूरे बिहार को हिला दिया है। जानिए कैसे “मोकामा में खून से सनी सियासत” ने 2025 के बिहार चुनाव की तस्वीर बदल दी।
🔥 मोकामा में खून से सनी सियासत: दुलारचंद यादव की हत्या ने हिला दिया बिहार चुनाव
बिहार की राजनीति में फिर खून बहा है। मोकामा की गलियों में गोलियों की आवाज़ गूंजी और “मोकामा में खून से सनी सियासत: दुलारचंद यादव की हत्या ने हिला दिया बिहार चुनाव” जैसी खबर ने पूरे राज्य को झकझोर दिया।
जन सुराज पार्टी के वरिष्ठ नेता और डॉन-टर्न-राजनेता दुलारचंद यादव की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई।
यह वारदात चुनाव से ठीक पहले हुई, जब वे प्रियदर्शी पियूष के लिए प्रचार कर रहे थे।
लोग कहते हैं — बिहार में चुनाव आते ही गोलियां चलना अब परंपरा बन चुकी है।
⚔️ बाहुबलियों की टक्कर ने ली एक जान
स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, यह घटना अनंत सिंह और जन सुराज समर्थकों के बीच झड़प के दौरान हुई।
पहले गरमागरम बहस, फिर अचानक गोलीबारी।
इसी बीच, दुलारचंद यादव को गोली लगी और फिर गाड़ी से कुचल दिया गया।
“मोकामा में खून से सनी सियासत: दुलारचंद यादव की हत्या ने हिला दिया बिहार चुनाव” — यह वाक्य अब हर न्यूज चैनल की हेडलाइन बन गया है।
🕵️♂️ पुलिस की जांच और शुरुआती खुलासे
पुलिस ने मौके से 10 से ज्यादा क्षतिग्रस्त गाड़ियां और खून के निशान बरामद किए हैं।
ग्रामीण एसपी विक्रम सिहाग ने बताया कि “पहली नजर में ऐसा लगता है कि यादव को गाड़ी से कुचलकर मारा गया है, लेकिन गोली लगने की संभावना भी है।”
फोरेंसिक टीम जांच में जुटी है, और जिला प्रशासन ने इलाके में भारी पुलिस बल तैनात किया है।
कानून-व्यवस्था पर उठ रहे सवालों के बीच एक ही बात दोहराई जा रही है —
👉 “मोकामा में खून से सनी सियासत: दुलारचंद यादव की हत्या ने हिला दिया बिहार चुनाव।”
🧍♂️ कौन थे दुलारचंद यादव
दुलारचंद यादव सिर्फ नाम नहीं, बल्कि मोकामा की राजनीति का चेहरा थे।
कभी लालू प्रसाद यादव के करीबी रहे और बाद में प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी से जुड़ गए।
90 के दशक में वे “डॉन” के रूप में जाने जाते थे, लेकिन राजनीति में आने के बाद खुद को “जनसेवक” कहते थे।
उनके खिलाफ 8 आपराधिक मामले दर्ज थे, मगर इलाके में उनकी पकड़ बेहद मजबूत थी।
उनकी मौत ने यह साफ कर दिया कि —
मोकामा की राजनीति आज भी बंदूकों की नाल से तय होती है।
⚖️ राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर
हत्या के बाद राजनीति गरमा गई है।
- जन सुराज के प्रियदर्शी पियूष ने कहा — “हमारे काफिले पर अनंत सिंह के समर्थकों ने हमला किया।”
- अनंत सिंह ने पलटवार करते हुए कहा — “यह सूरजभान सिंह की साजिश है, ताकि मुझे फंसाया जा सके।”
- तेजस्वी यादव ने नीतीश कुमार सरकार पर हमला करते हुए कहा — “यह एनडीए के जंगलराज की निशानी है।”
हर बयान के बीच एक ही बात गूंज रही है —
🩸 “मोकामा में खून से सनी सियासत: दुलारचंद यादव की हत्या ने हिला दिया बिहार चुनाव।”
🗳️ चुनाव से पहले हिंसा का डर
6 नवंबर को होने वाले पहले चरण के मतदान से पहले यह घटना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गई है।
लोग अब वोट से पहले सुरक्षा मांग रहे हैं।
चुनाव आयोग पर दबाव है कि मोकामा जैसे संवेदनशील इलाकों में फोर्स तैनाती बढ़ाई जाए और निष्पक्ष माहौल सुनिश्चित किया जाए।
यह सवाल अब हर बिहारवासी के मन में है —
👉 क्या इस बार भी खून और बाहुबल ही तय करेंगे कि मोकामा से कौन जीतेगा?
🧩 बिहार की सियासत में खून की परंपरा
मोकामा का इतिहास बाहुबल और जातीय राजनीति से भरा है।
यहां भूमिहार और यादव समुदाय के बीच वर्चस्व की जंग दशकों से जारी है।
आज की यह घटना उसी पुरानी कहानी का नया अध्याय है।
और इस बार अध्याय का नाम है —
📍 “मोकामा में खून से सनी सियासत: दुलारचंद यादव की हत्या ने हिला दिया बिहार चुनाव”
🧠 निष्कर्ष: खून, राजनीति और डर का संगम
दुलारचंद यादव की हत्या ने यह साबित कर दिया कि बिहार में सत्ता की लड़ाई अब भी बंदूकों से लड़ी जाती है।
यह सिर्फ एक हत्या नहीं, बल्कि एक संदेश है —
कि मोकामा में खून से सनी सियासत अब भी जिंदा है।
बिहार के मतदाताओं के लिए यह घटना चेतावनी है कि आने वाले चुनावों में न सिर्फ नेता, बल्कि जनता की सुरक्षा और समझदारी भी दांव पर है।